Campaign messages in Hindi
दिन 10
जब बच्चों को बार-बार दंड दिया जाता है तो वे शर्मिंदगी, क्रोध और आक्रमकता उनके व्यसक जीवन पर भी बुरा प्रभाव डालती है।
दंड देना समाज में हिंसा और असंतोष को बढ़ाता हैं।
जब बच्चों की परवरिश आदरपूर्ण और प्रेमभरे वातावरण में की जाती हैं तो वे बड़े हो कर दूसरों के प्रति जिम्मेदार और संवेदनशील होते हैं।
सकारात्मकअनुशासन एक सहानुभूतिशील समाज का निर्माण करने में मदद करता है।
दिमाग का विज्ञान : माता-पिता, शिक्षकऔरदेखभाल करनेवाले बच्चे की बुद्धि के निर्माणकर्त्ता हैं।बच्चों के साथ हमारा बर्ताव उनके दिमाग को विकसित करता है।जब हम बच्चों को ख्याल से बड़ा करेंगे तभी बच्चे बड़े होकर ख्याल करेंगे।
दिन ९
"अरे.. अपने दोस्त के साथ खिलोने मिल बाँट कर क्यों नहीं खेल रहे? तुम इतने स्वार्थी क्यों हो? यदि तुम मिल बाँट कर नहीं खेलोगे तो मैं सारे खिलौने उठाकर अंदर रख दूँगी | किसी को भी खिलोने नहीं मिलेंगे ।"
दंड मिलने पर बच्चों को खुद पर शक होता है और उनके आत्मा सम्मान को ठेस पहुँचती है ।
“जब तुम्हारे दोस्त घर आये थे , तो मैंने देखा कि तुम अपने खिलौने उनको नहीं दे रहे थे । शायद कुछ खिलोने तुम्हारे बहुत पसंदीदा हैं जिन्हें दूसरों के साथ बांटने में तुम्हे कठिनाई होती है । अगली बार दोस्तों के आने से पहले ही क्या तुम कुछ खिलोने अंदर रखना चाहोगे ? तुम तय कर सकते हो कि कौनसे खिलोने मिल बाँट कर खेलने में तुम खुश हो| "
सकारात्मक अनुशासन बच्चों को सोचने और निर्णय लेने के अवसर देकर सम्मानपूर्वक मार्गदर्शन करता है।
'योर चाइल्ड्स सेल्फ-एस्टीम' पुस्तक की लेखिका डोरोथी ब्रिग्स के अनुसार, जब बच्चों को बताया जाता है कि वे शरारती, जिद्दी, आलसी, बुरे आदि हैं तो वे इन बातों को अपने बारे में मानना शुरू कर देते हैं। हम माता-पिता एक दर्पण की तरह हैं और हम जो दर्शाते हैं वह बच्चे स्वयं की छवि मान लेते हैं। ये लेबल बड़े होने पर भी उनके साथ रहते हैं।
जब हम बच्चे को मारते हैं, डांटते हैं, धमकाते हैं या बच्चे को टाइम-आउट में डालते हैं, तो बचछे को चोट पहुँचती है ओर वह और अकेला महसूस करता है।
दंड देने के कारण माता-पिता और बच्चे के बीच का बंधन कमज़ोर पद जाता है |
बच्चों को ज्ञात होता है कि हम उन्हें समझते हैं जब हम बच्चों के साथ मिलकर समस्ययो का हल खोजते है, सहानुभूति के साथ सीमाऐ निर्धारित करते हैं, संवेदनशीलता के साथ बच्चों का मार्गदर्शन करते हैं, हमारी अपेक्षाओं का सम्मानपूर्वक संवाद करते हैं और जब हमारी गलती होती है तब बच्चे से माफी मांगते हैं |
सकारात्मक अनुशासन संघर्ष के समय में भी माता-पिता और बच्चे के बीच के संबंध बनाए रखता है।
दिमाग का विज्ञान : सेंटर ऑन द डेवलपिंग चाइल्ड, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के अनुसार, माता-पिता के साथ प्रेमभरा और ममतापूर्वक व्यव्हार ही बच्चे की बुद्धि के उत्तम विकास में सहायक होता है |
दिन 7
"अपने भाई को मारना बंद करो। उसके साथइतने बुरे से क्यूं पेश आ रहे हो?”माता पिता बच्चे से गुस्सा हो कर उसे थप्पड़ लगा देते हैं।
बच्चों पर हाथ उठाना या उनपर शारिरीक बल का उपयोग करना बच्चों को सिखाता है कि अपने गुस्से को व्यक्त करने का यह सही तरीका है। यहाँ हम बच्चों के लिये सकारत्मक रोल मॉडल नहीं बन पाते हैं।
"किसी परहाथ उठाना गलत बात है।हमारेघर में मार पीट मना है | आपको अगर कोई बात अच्छी नहीं लगी तो शब्दों का प्रयोग करके अपनी परेशानी बताओं"
सकारत्मक अनुशाशन के जरिये हम बच्चों के आदर्श बन सकते हैं।और उन्हें बता सकते है कि जब हम गुस्से में होते हैं तब भी हम बिना चोट या हिंसा का उपयोग किए बिना खुद की भावनाओं को व्यक्त कर सकते हैं।
दिमाग का विज्ञान : बच्चों को यह बात आतंकित करती है कि जो व्यक्ति उन्हें इस दुनिया में सबसे सुरक्षित रख सकता हैं वही उन्हें नुक्सान पहुंचा रहा हैं। इस परिस्थिति में बच्चे का दिमाग 'फाइट या फ्लाइट मोड' में चला जाता है। और ऐसे में बच्चा परिस्थिति से या तो भाग जाना चाहेगाहै या फिर पलट कर मारनाचाहेगा.
दिन 6
"मैं तुम्हारे लिये यह नहीं खरीद रहा हुँ| अगर तुमने रोना बंद नही किया तो मैं तुम्हे यहीं छोड़ कर चला जाऊंगा"
दंड और धमकियां बच्चों को भावनाओं को छिपानेके लिए मजबूर करती है।बाद में बच्चे इन भावनाओं को अस्वस्थ तरीकोंसे व्यक्त करते हैं जैसे गुस्सा होना,दूसरों को मारना या धमकाना।
" इतने सारे खिलोने देखकर तुम्हे खिलौना खरीदने का बहुत मन कर रहा है ना? जब मैंने खरीदने से माना कर दिया,मैं समझ सकता हुँ कि तुम्हे कितना बुरा लगा होगा "
सकारत्मक अनुशाशन में हम बच्चों की भावनाओं को समझते भी हैं और उन्हें सहानभूति के साथ स्वीकार भी करते हैं।
इससे बच्चों को आगे चलकर अपने भावनाओं को सही तरीके से सम्भालने में मदद मिलती है।
दिमाग का विज्ञान: बच्चों को उनकी भावनाओं को सम्भलना और उन्हे स्वस्थ तरीके से व्यक्त करना सिखाया जा सकता है। बड़ों के संवेदनशील और सहायक प्रतिक्रियाओं से बच्चो में सहनशीलता और भावनात्मक बुद्धि का निर्माण होता है।"
दिन 5
सजा देने का असर सिर्फ थोड़े समय तक ही होता है |
माता पिता के आने की आवाज सुनते ही बच्चा दौड़ कर टी.वी.बन्द कर देता है। पढ़ाई करने के लिये जबतक चिल्लाया ना जाये, वो पढ़ने नहीं बैठता। "अगर तुमने अपना खाना खतम नहीं किया तो तम्हें आइसक्रीम नही मिलेगी", खाना भी बिना धमकी के खतम नहीं करता।
इस स्थिति में ,बच्चे आज्ञा का पालन तब तक करते हैं जब तकउन्के माता पिता बात मनवाने के लिए मजबूर करते हैं। इस तरह का अनुशाशन बहुत देर तक टिकता नहीं|
सकारत्मक अनुशाशन लम्बे समय तक के लिये अनुशाशन बनाए रखने में कामयाब रहता है।
समय के साथ बच्चा अपनी जिम्मेदारी समझने लगता है। अपने माता पिता के साथ मिलकर बच्चा जो भी नियम बनाता है या समय निशचित करता है, वो उसी के अनुसार टीवी बंद करके अपनी पढ़ाई करने बैठ जाता है|
जब माता पिता या देखभाल करने वाले लोग स्पष्ट रूप से नियम बनाते हैं या बच्चो को अपनी अपेक्षाएँ बताते हैं, तब बच्चे अपनेआप उन सीमओं में रहना और अपनी सीमा खुद निर्धारित करना सीख जाते हैं।
दिमाग का विज्ञान: जब बच्चे अपनी सीमा निर्धारित करने में खुद भाग लेते हैं, तब उनके नुयरल पाथवेस (तंत्रिका मार्ग) से दिमाग में सोंचने की शक्ती विकसित होती है। और यही उन्हें आने वाले दिनों में सही कारण के लिये सही कार्य करने में सहयता करता है।
बच्चे का पालन करने के लिए दंड का प्रयोग ,बच्चे पर ‘हमारी पावर या धौस जमाने’ पर निर्भर है।माता-पिता की प्रतिक्रिया के डर से और माता-पिता के प्यार को खोने के डर के कारण ही बच्चा सही काम करता है या उनकी बात सुनता है।
पेरेंटिंग मैटर्स के द्वारा जनहित में जारीI

